Tuesday, July 22, 2025

18 ಮಂಗನಿಂದ ಮಾನವ: ಅರಿವಿನ ಬೆಳವಣಿಗೆಯ ಹಾದಿ


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ब्रीफिंग दस्तावेज़: संज्ञानात्मक विकास के मुख्य विषय

यह दस्तावेज़ डॉ. सुधींद्र एस.जी. के "18_cognitive_development.pdf" से प्राप्त जानकारी के आधार पर संज्ञानात्मक विकास के प्रमुख विषयों और महत्वपूर्ण विचारों की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करता है।

1. संज्ञानात्मक विकास क्या है?

डॉ. सुधींद्र एस.जी. बताते हैं कि संज्ञानात्मक विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति समय के साथ ज्ञान प्राप्त करता है, सोचता है, जानता है, याद रखता है और संवाद करता है। यह हमारे मन और दुनिया के साथ उसके संबंध के बढ़ने को संदर्भित करता है।

  • मूल विचार: "आप समझ सकते हैं कि आपके फोन की मूल जगह कहां है, कंटेनर के आकार के आधार पर पानी के स्तर का अनुमान लगा सकते हैं, ये सब आप इसलिए कर पाते हैं क्योंकि आप संज्ञानात्मक विकास के मार्ग पर बहुत आगे हैं।"
  • प्रभावित करने वाले कारक: "हमारा आनुवंशिकी और हमारा वातावरण दोनों ही हमारे जन्म से पहले ही हमारे विकास को प्रभावित करना शुरू कर देते हैं, और वे हमारे सीखने को तब तक प्रभावित करते रहते हैं जब तक हम मर नहीं जाते।"
  • मस्तिष्क का विकास: यद्यपि हम लगभग उतने ही मस्तिष्क कोशिकाओं के साथ पैदा होते हैं जितने हमें कभी मिलेंगे, "हमारे मस्तिष्क के हार्डवेयर का पूरा सेट हमारे तंत्रिका नेटवर्क के अधिक जटिल होने के कारण ठोस होने में वर्षों लगते हैं।"
  • विकास मनोविज्ञान: शारीरिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तनों का अध्ययन जो हमारे पूरे जीवन में होता है - प्रसव पूर्व से लेकर किशोरावस्था तक और सेवानिवृत्ति के बाद तक - को विकास मनोविज्ञान कहा जाता है।

2. परिपक्वता (Maturation)

डॉ. सुधींद्र जोर देते हैं कि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हम व्यवहार और रूप-रंग में परिवर्तनों के एक क्रम का पालन करते हैं जिसे परिपक्वता कहा जाता है।

  • क्रमबद्धता: "हम बैठने से पहले लुढ़कते हैं, खड़े होने से पहले बैठते हैं, और चलने से पहले खड़े होते हैं, और ब्रेक डांस करने से पहले चलते हैं।" यह संज्ञानात्मक विकास पर भी लागू होता है।

3. जीन पियाजे का योगदान

संज्ञानात्मक विकास को समझने में जीन पियाजे, एक स्विस विकासात्मक मनोवैज्ञानिक, का महत्वपूर्ण योगदान है।

  • बच्चों की सोच में अंतर: पियाजे ने देखा कि "छोटी उम्र के बच्चे लगातार कुछ खास गलतियाँ करते हैं जो बड़े बच्चे और वयस्क नहीं करते।" उन्होंने सिद्धांत दिया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य संज्ञानात्मक विकास और बौद्धिक प्रगति के विशिष्ट चरणों से गुजरते हैं।
  • मुख्य प्रश्न: उनके अध्ययन का मुख्य प्रश्न था 'ज्ञान कैसे बढ़ता है?'
  • स्कीमा (Schemas): पियाजे ने प्रस्तावित किया कि जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और अपने अनुभवों को समझने के लिए संघर्ष करते हैं, हम स्कीमा बनाते हैं। "स्कीमा मानसिक ढाँचे हैं जो जानकारी की व्याख्या करने में मदद करते हैं।" ये अवधारणाएं हैं, जैसे पक्षी या दोस्ती।
  • संज्ञानात्मक संतुलन (Cognitive Equilibrium): हम "अपने विचार प्रक्रियाओं और अपने वातावरण के बीच संज्ञानात्मक संतुलन, या सद्भाव के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।"
  • अनुकूलन की प्रक्रियाएं:आत्मसात्करण (Assimilation): नए अनुभवों की व्याख्या मौजूदा स्कीमा के संदर्भ में करना। उदाहरण के लिए, एक बच्चा हिरण को घोड़ा कह सकता है क्योंकि उसके पास घोड़े का स्कीमा है।
  • समायोजन (Accommodation): नए अनुभवों के अनुकूल होने के लिए स्कीमा को समायोजित करना। बच्चे को बाद में पता चलता है कि हिरण घोड़े नहीं हैं और वह अपने स्कीमा को समायोजित करता है।

4. डॉ. सुधींद्र एस.जी. द्वारा प्रस्तुत पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के चार चरण

डॉ. सुधींद्र एस.जी. पियाजे के अध्ययन के आधार पर संज्ञानात्मक विकास के चार चरणों का वर्णन करते हैं:

4.1. संवेदी-गामक अवस्था (Sensorimotor Stage)

  • अवधि: जन्म से लगभग दो वर्ष की आयु तक।
  • विशेषता: बच्चे अपनी इंद्रियों और क्रियाओं (छूना, पकड़ना, देखना, सुनना, मुंह में डालना) के माध्यम से दुनिया का अनुभव करते हैं।
  • प्रमुख उपलब्धि: "वस्तु स्थायित्व (object permanence) की कमी", यानी बच्चे यह नहीं समझते कि वस्तुएं अभी भी मौजूद हैं जब वे दृष्टि से ओझल हों। हालांकि, यह क्षमता इस चरण के अंत तक विकसित हो जाती है।

4.2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Preoperational Stage)

  • अवधि: लगभग दो वर्ष की आयु से छह या सात वर्ष तक।
  • विशेषता:अहंकेन्द्रवाद (Egocentrism): "इस उम्र के बच्चों की खासियत यह है कि सब कुछ उनके बारे में होता है।" उन्हें दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण की कल्पना करना मुश्किल होता है। डॉ. सुधींद्र अपने बचपन का अनुभव बताते हैं: "अगर किसी ने उनसे पूछा कि क्या आपका कोई भाई है, तो वे कहते थे, हाँ मेरा एक भाई है, उसका नाम रवि है। फिर जब उन्होंने पूछा, क्या रवि का कोई भाई है? तो मैं कहता था, नहीं नहीं, केवल मेरा एक भाई है।"
  • मानसिक प्रतिनिधित्व: बच्चे वस्तुओं और घटनाओं को शब्दों और छवियों से मानसिक रूप से प्रस्तुत कर सकते हैं।
  • जीववाद (Animism): वे मानते हैं कि निर्जीव वस्तुओं (जैसे पसंदीदा खिलौने) में भावनाएं और राय होती हैं।
  • संरक्षण (Conservation) की कमी: बच्चों को यह अवधारणा समझने में कठिनाई होती है कि मात्रा समान रहती है भले ही कंटेनर का आकार बदल जाए (जैसे पानी के विभिन्न कंटेनर)
  • उत्क्रमणशीलता (Reversibility) की कमी: उन्हें मानसिक रूप से किसी प्रक्रिया को उलटना मुश्किल लगता है (जैसे मिट्टी की गेंद को चपटा करने के बाद वापस गेंद बनाना)
  • केंद्रण (Centration): "बच्चे की किसी समस्या या वस्तु के केवल एक पहलू पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति" (जैसे कंटेनर का आकार)
  • विकास की शुरुआत: इस चरण के दूसरे भाग में, बच्चे "मन के सिद्धांत (theory of mind)" को बनाना शुरू करते हैं, जो दूसरों की भावनाओं, विचारों और धारणाओं को समझने की क्षमता है।

4.3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage)

  • अवधि: लगभग छह या सात वर्ष की आयु से ग्यारह या बारह वर्ष तक।
  • विशेषता:तार्किक सोच: बच्चे अपने द्वारा अनुभव की गई ठोस घटनाओं के बारे में तार्किक रूप से सोचना शुरू कर देते हैं।
  • विकेंद्रण (Decentration): वे "किसी वस्तु या समस्या के केवल एक पहलू से आगे देख पाते हैं।"
  • संरक्षण और उत्क्रमणशीलता: इस चरण में संरक्षण और उत्क्रमणशीलता की समस्याएं खत्म हो जाती हैं।

4.4. औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage)

  • अवधि: लगभग बारह वर्ष की आयु से जीवन के अंत तक।
  • विशेषता:अमूर्त सोच: तर्क अधिक अमूर्त सोच, समस्या-समाधान और काल्पनिक प्रश्नों को शामिल करने के लिए फैलता है।
  • आधुनिक संदर्भ में परिवर्तन: डॉ. सुधींद्र एस.जी. का कहना है कि यह चार-चरणीय सूत्र "अधिक सरलीकृत होता जा रहा है और नई Gen Z बच्चों में यह इतना सरल नहीं है और यह अधिक जटिल है।"
  • त्वरित विकास: "आज, उदाहरण के लिए, डॉ. सुधींद्र एस.जी. ने इन चरणों का पता पहले की तुलना में कम उम्र में लगाया है - कभी-कभी बहुत पहले - जैसे कुछ प्रकार के वस्तु स्थायित्व तीन महीने के बच्चों में देखे गए हैं।"

5. लेव वायगोत्स्की का सिद्धांत

डॉ. सुधींद्र एस.जी. रूसी मनोवैज्ञानिक लेव वायगोत्स्की के विचारों का भी उल्लेख करते हैं:

  • सामाजिक वातावरण पर जोर: "पियाजे ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि बच्चे का मन अपने भौतिक वातावरण के साथ बातचीत करके कैसे बढ़ता है, वायगोत्स्की ने इस बात पर जोर दिया कि प्रारंभिक विकास माता-पिता के निर्देश और सामाजिक वातावरण के साथ बातचीत के माध्यम से होता है।"
  • सेट चरणों पर कम विश्वास: उन्होंने सेट चरणों में कम विश्वास किया।
  • मचान (Scaffolding): उन्होंने इस विचार में अधिक विश्वास किया कि "देखभाल करने वाले वयस्क एक प्रकार का मचान प्रदान करते हैं, जो बच्चों को सोचने और सीखने के उच्च स्तर तक चढ़ने में मदद करता है।"
  • भाषा का महत्व: वायगोत्स्की ने "चीजों को अर्थ प्रदान करने के तरीके के रूप में भाषा पर बहुत जोर दिया।"
  • सांस्कृतिक विविधता: उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बच्चों के विकसित होने के तरीके "वास्तव में संस्कृतियों में भिन्न हो सकते हैं।"

6. निष्कर्ष

  • पियाजे की सबसे बड़ी उपलब्धि: "पियाजे की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद इस अवधारणा में सैद्धांतिक गहराई विकसित करना था कि बच्चे वास्तव में वयस्कों से बहुत अलग तरीके से सोचते हैं।"
  • प्रभाव: उनका काम "अनुसंधान के एक नए युग को प्रेरित किया" और माता-पिता और शिक्षकों की मदद की है।
  • निरंतर प्रासंगिकता: "हालांकि पियाजे एकमात्र विकासात्मकवादी नहीं थे, या यहां तक कि पहले भी नहीं थे, वह निश्चित रूप से सबसे प्रभावशाली में से एक हैं, और आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।"
  • भावी चर्चा: अगला सत्र डॉ. सुधींद्र एस.जी. के नए सिद्धांत, "मंगनिंदा मानवा" (मनुष्य से बंदर) पर चर्चा करेगा।

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